माइनस तापमान में लाहुल का गोची महोत्सव शुरू, क्या है अनोखी परंपरा...

लाहुल-स्पीति में माइनस तापमान के बीच गोची उत्सव की धूम। अनोखी परंपराएं, तीर से भविष्यवाणी और देव आस्था से जुड़ा खास आयोजन।

Feb 13, 2026 - 20:07
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माइनस तापमान में लाहुल का गोची महोत्सव शुरू, क्या है अनोखी परंपरा...

केलांग । शीतमरूस्थल जनजातीय जिला लाहुल- स्पीति जो क्षेत्रफल के आधार पर भी हिमाचल प्रदेश में सबसे बड़ा माना जाता है। वहीं यह सांस्कृतिक क्षेत्र में भी काफी समृद्ध है। यहां पर कई ऐसे रीति रिवाज और उत्सव है जो देश दुनिया के पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। ऐसे में सर्दियों के तापमान के बीच भी इन दिनों लोग गोची उत्सव भी यहां धूमधाम के साथ मना रहे हैं। गोची उत्सव लाहुल घाटी में बेटा और बेटी के पैदा होने की खुशी में मनाया जाता है। इतना ही नहीं यहां तीर चला कर यह बात तय की जाती है कि अगले साल इस गांव में कितने बेटे पैदा होंगे।

ऐसे में तापमान में भी लोग आज भी इस परंपरा का पालन कर रहे हैं और गांव के हर घर में पारंपरिक पकवानों के साथ-साथ गोची उत्सव की भी खुशियां मनाई जा रही है। लाहुल-स्पीति की गाहर घाटी के बिलिंग गांव से इस गोची उत्सव को मनाने की शुरुआत हो गई हैं। हर गांव में इसे अलग अलग दिन मनाया जाता है। गाहर घाटी के अधिकतर गांव में बेटा पैदा होने की खुशी में इसका आयोजन किया जाता हैं। इस साल बिलिंग गांव में चार परिवारों में पुत्र रत्न की प्राप्ति होने पर गोची उत्सव मनाया जा रहा है।

इनमें लारजे जायलत्से नोरब, स्वाची के जिगमेद उरज्ञान पांस जितसेन नमसेल और गुमलिंगपा के जिगमेद तोबदन के परिवार शामिल हैं। यह सभी परिवार अपने घर में विशेष आयोजन करते हैं। जिसमें सभी ग्रामीण मिलकर उनके घर जाते हैं और बेटा पैदा होने की भी इन्हें बधाई देते हैं। परिवार के लोगों के द्वारा सभी ग्रामीणों को पारंपरिक पकवान परोसे जाते हैं और नाचते गाते हुए इस उत्सव को धूमधाम से मनाया जाता है। लाहुल घाटी में गोची उत्सव के दौरान एक खास तरह की परंपरा का पालन भी किया जाता हैं। जिसमें बाण चलाकर बेटों के पैदा होने की भविष्यवाणी की जाती है। इस उत्सव में शामिल लोग अपने इष्ट देवी-देवताओं के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। घाटी के लोगों का मानना है कि अपने इष्ट देवी-देवताओं की कृपा से ही पुत्रहीन परिवारों को पुत्ररत्न की प्राप्ति होगी। वहीं, इस गोची उत्सव में केवल वही परिवार हिस्सा लेते हैं। जिनके घर में कुछ वक्त पहले बेटे का जन्म हुआ हो। इसमें विभिन्न गांव में अलग.अलग तरह के पुतले बनाकर उन पर तीर चलाया जाता है। कुछ गांव में कपड़े का याक बनाया जाता है। कुछ जगह पर मक्खन से बने बकरे की मूर्ति बनाई जाती है। तो कुछ जगहों पर बर्फ से शिवलिंग तैयार किया जाता है।

इन सभी चीजों पर पहले गांव के पुजारी के द्वारा तीर चलाया जाता है और उसके बाद ग्रामीण इसमें भाग लेते हैं। मान्यता है कि जिस व्यक्ति का तीर इन मूर्तियों पर लगता है। तो उसे साल भर के भीतर ही पुत्र प्राप्ति होती है। ऐसे में ग्रामीण धार्मिक आस्था के साथ इस त्यौहार को मानते हैं और जिन जिन लोगों का तीर मूर्ति पर लगता है। उनके घरों में भी पुत्र प्राप्ति हुई है। लाहुल-स्पीति की अगर बात करे तो गाहर घाटी के बिलिंग, ग्वाजांग, कारदंग, लोअर केलांग और अप्पर केलांग में यह गोची उत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इस खास अवसर पर लोग पुजारी के घर एकत्रित होकर युल्सा देवता ;बौद्ध धर्म की आराधना करते हैं। इसके बाद पुजारी और सहायक पुजारी पारंपरिक वेशभूषा में तैयार होकर उन घरों में जाते हैं। जिन लोगों के घरों में बेटा पैदा हुआ होता है। उस घर के लोग धार्मिक कार्यों को पूरा करने के लिए खुलसी यानि भूसे से भरी हुई बकरी की खालए पोकन यानी आटे की तीन फीट ऊंची आकृति, छांग मतलब मक्खन से बनी बकरी की आकृति और मशाल देते हैं। इस सामान को देव स्थान पर विधिपूर्वक स्थापित किया जाता है। जिसके बाद पुजारी बकरी की खाल पर धनुष.बाण से निशाना लगाता है। बाणों की संख्या पुजारी तय करता है और जितने बाण निशाने पर लगते हैं। उसी आधार पर पुजारी आगामी वर्ष में बेटे पैदा होने की भविष्यवाणी करता है।

क्या बोले कुंगा बौध
पूर्व जिला परिषद सदस्य कुंगा बोध ने बताया कि सदियों से घाटी में इस परंपरा का पालन किया जा रहा है और इस परंपरा के प्रति लोगों में श्रद्धा भी बहुत है। सबसे पहले यह उत्सव बिलिंग गांव में मनाया जाता है। ग्रामीण अठारह नाग देवता की पूजा अर्चना करते हैं। गोची उत्सव उन लोगों के लिए मनाना काफी आवश्यक होता है जिन घरों में पुत्र की प्राप्ति हुई हो। वह परिवार अपने घर पर एक भव्य आयोजन करते हैं और स्थानीय लोग भी उस आयोजन में शामिल होते हैं। इसमें पारंपरिक खान-पान से मेहमानों की आवभगत की जाती है। जिन परिवारों में बेटा पैदा हुआ है वही परिवार इस साल धनुष बाण वाली परंपरा में लगने वाली सभी सामग्री का इंतजाम करते हैं।

इसके अलावा इस साल जिन परिवारों में पुत्र पैदा होगा अगले साल वो परिवार इस परंपरा को आगे बढ़ाएगा। पूर्व जिला परिषद सदस्य कुंगा बौद्ध ने बताया कि पुजारी के द्वारा इस बार भी करीब 15 तीर चलाए गए। जिसमें तीन तीर कपड़े पर बनाए गए याक के चित्र पर लगे हैं। ऐसे में पुजारी के द्वारा अगले साल के लिए तीन पुत्र होने की भी भविष्यवाणी की गई है। बीते साल भी दो दर्जन तीर चलाए गए थे और पुजारी के द्वारा इस समय भी पुत्र होने की भविष्यवाणी की गई थी। चार दिनों तक बिलिंग गांव में यह उत्सव मनाया जाएगा। पहले दिन देवी देवताओं की पूजा अर्चना की गई और उसके बाद सभी ग्रामीण प्रत्येक दिन हर परिवार में जाकर जश्न मनाएंगे। जिनके घर में पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई है।

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