मंडी शिवरात्रि में 500 साल बाद भी पांच देव नाराज
मंडी छोटी काशी शिवरात्रि महोत्सव के 500 वर्ष पूरे, फिर भी सनोरघाटी के पांच देव धुरी विवाद के कारण शामिल नहीं होंगे। परंपरा और इतिहास जुड़ी बड़ी कहानी।
मंडी । छोटी काशी का शिवरात्रि महोत्सव खास है। राजा अजबर सेन द्वारा 1527 में शहर की स्थापना के 500 वर्ष पूरे होने पर हो रहे जश्न के बीच भी धुरी विवाद की बर्फ पिघल नहीं पाई है। सनोरघाटी के पांच देवी देवता आज भी नाराज हैं और शिवरात्रि के जश्न से आजादी के बाद से ही दूरी बनाए बैठे हैं। ज्वालापुर क्षेत्र के देव कगसी नारायण, देव बरनाग, चंडोही गणपति, देव खवलासी नारायण और द्रंग क्षेत्र की माता कुमणी रियासत काल में तो शिवरात्रि महोत्सव के नियमित और सम्मानित अतिथि हुआ करते थे। रियासत खत्म होने के बाद आजादी से ही यह देवता मंडी शिवरात्रि में शिरकत नहीं कर रहे।
500वें वर्ष के इस ऐतिहासिक आयोजन में भी उनकी पालकियां अनुपस्थित रहेंगी। इन देवताओं के शिवरात्रि महोत्सव में न आने के पीछे एक प्रसिद्ध धुरी विवाद रहा है। राजदेवता माधव राय की पालकी के दाएं-बाएं चलने का स्थान देवताओं की प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है। दायां स्थान श्रेष्ठ समझा जाता था। चंदेही गणपति और देव बरनाग के बीच इस प्रोटोकॉल को लेकर तीखा विवाद हो गया। स्थानीय परंपरा के अनुसार इस धुरी के विवाद ने देवताओं को इतना नाराज कर दिया कि उन्होंने शिवरात्रि जलेब में आने से इनकार कर दिया।
मनाने का किया प्रयास
सर्व देवता कमेटी के अध्यक्ष पंडित शिवपाल ने कहा कि सनोरघाटी के देव कगसी नारायण, देव बरनाग, चंडोही गणपति, खबलासी नारायण और कुमणी माता को मनाने और पुराने विवादों को खत्म करने का प्रयास किया गया लेकिन इसमें कामयाबी नहीं मिली।
प्रशासन ने ली राजा की जगह
रियासत काल में राजा के निमंत्रण और सम्मान के साथ यह देवता आते रहे, लेकिन विवाद के बाद उन्होंने मंडी आने का सिलसिला ही रोक दिया। आजादी के बाद प्रशासन ने राजा की जगह ली, लेकिन देव संस्कृति में एक बार हुई नाराजगी आसानी से टलती नहीं है। देवता यहां जीवंत माने जाते हैं। उनके अपने अहं, भावनाएं और ऐतिहासिक स्मृतियां होती हैं।
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