हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: बागी विधायकों की पेंशन बहाल, सुक्खू सरकार पर BJP का हमला
हिमाचल हाईकोर्ट ने बागी पूर्व विधायकों को राहत देते हुए पेंशन जारी करने के आदेश दिए। तय समय में भुगतान न होने पर ब्याज भी देना होगा।
रोज़ाना हिमाचल ब्यूरो। शिमला
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाले फैसले में कांग्रेस से बागी होकर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए छह पूर्व विधायकों को बड़ी राहत प्रदान की है। अदालत ने स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा है कि इन पूर्व विधायकों को उनकी पेंशन और बकाया राशि एक माह के भीतर जारी की जाए। यदि तय समय सीमा के भीतर भुगतान नहीं किया गया तो राज्य सरकार को 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ राशि का भुगतान करना होगा।
यह निर्णय न केवल इन पूर्व विधायकों के लिए राहत भरा है, बल्कि प्रदेश की राजनीति में भी एक नई बहस को जन्म दे चुका है। फैसले के बाद भाजपा ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सरकार, विशेष रूप से मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली सरकार पर तीखा हमला बोला है।
कोर्ट का स्पष्ट रुख: कानून भविष्य के लिए, न कि अतीत के लिए
हाईकोर्ट ने अपने 07 अप्रैल 2026 के आदेश में यह स्पष्ट किया कि हिमाचल प्रदेश विधानसभा द्वारा पारित संशोधन विधेयक को पूर्व प्रभाव से लागू नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि किसी भी कानून को पीछे की तारीख से लागू करना न्यायसंगत नहीं है, विशेषकर तब जब वह किसी व्यक्ति के अधिकारों को प्रभावित करता हो।
कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि संबंधित पूर्व विधायकों को पेंशन से वंचित रखना विधिसम्मत नहीं है, क्योंकि उस समय ऐसा कोई प्रावधान प्रभावी रूप से लागू नहीं था जो उनकी पेंशन रोक सके। इस प्रकार अदालत ने संविधान और विधि के मूल सिद्धांतों की पुनः पुष्टि की है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला तब शुरू हुआ जब कांग्रेस से बगावत कर कुछ विधायकों ने भाजपा का दामन थाम लिया। इसके बाद विधानसभा अध्यक्ष द्वारा उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया। अयोग्यता के बाद इन विधायकों की पेंशन रोक दी गई, जिसके खिलाफ उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया।
कांग्रेस सरकार ने वर्ष 2024 में एक संशोधन विधेयक लाकर यह प्रावधान करने की कोशिश की थी कि जो विधायक दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य घोषित किए जाते हैं, उन्हें पेंशन नहीं दी जाएगी। हालांकि, इस विधेयक को बाद में वापस लेना पड़ा और वर्ष 2026 में नया संशोधन लाया गया, जिसे केवल भविष्य के मामलों पर लागू किया गया।
दसवीं अनुसूची और विवाद
इस पूरे मामले में संविधान की दसवीं अनुसूची (Anti-Defection Law) भी चर्चा का केंद्र रही। इस प्रावधान का उद्देश्य दल-बदल को रोकना है, लेकिन भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस सरकार ने इसका दुरुपयोग करते हुए पूर्व विधायकों के अधिकारों को समाप्त करने का प्रयास किया।
भाजपा नेताओं का कहना है कि दसवीं अनुसूची केवल सदस्यता समाप्त करने तक सीमित है, न कि पेंशन जैसे पूर्व अधिकारों को खत्म करने के लिए। अदालत के फैसले ने इस तर्क को भी मजबूती दी है।
भाजपा का तीखा हमला
भाजपा प्रवक्ता आशीष शर्मा ने इस फैसले को सुक्खू सरकार के लिए “तमाचा” बताते हुए कहा कि कांग्रेस सरकार ने कानून का इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिशोध के लिए किया।
उन्होंने कहा कि सरकार ने सत्ता में आते ही विपक्ष को निशाना बनाने और विरोध करने वाले नेताओं को परेशान करने की नीति अपनाई। लेकिन अब न्यायालय के फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कानून का इस्तेमाल किसी को टारगेट करने के लिए नहीं किया जा सकता।
‘बदले की राजनीति’ बनाम ‘समान दृष्टि’
आशीष शर्मा ने आरोप लगाया कि सुक्खू सरकार ‘समान दृष्टि’ की बजाय ‘बदले की भावना’ से काम कर रही है। उन्होंने कहा कि सरकार ने दो वर्षों तक पूर्व विधायकों को मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित किया और उनकी वैध पेंशन को रोके रखा।
भाजपा का दावा है कि यह पूरा मामला कांग्रेस की “Deflection Politics” का उदाहरण है, जहां सरकार अपनी विफलताओं से ध्यान हटाने के लिए नए विवाद खड़े करती है।
राजनीतिक असर और आगे की रणनीति
इस फैसले के बाद प्रदेश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। भाजपा ने संकेत दिए हैं कि वह इस मुद्दे को जनता के बीच लेकर जाएगी और कांग्रेस सरकार की नीतियों को उजागर करेगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला आने वाले समय में एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है, खासकर तब जब इसमें लोकतंत्र, संविधान और अधिकारों जैसे संवेदनशील मुद्दे जुड़े हों।
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