मंडी शिवरात्रि: छांजणू-छमांहू की अनोखी परंपरा
मंडी शिवरात्रि में छांजणू-छमांहू देवता निभा रहे सदियों पुरानी गुरु-शिष्य परंपरा, शाही जलेब में सबसे आगे चलते हैं रथ।
मंडी। अंतरराष्ट्रीय शिवरात्रि महोत्सव के दौरान निकलने वाली राजदेवता माधोराय की शाही जलेब में सबसे आगे चलने वाले दो देवता छांजणू और छमांहू गुरु-शिष्य परंपरा के अद्वितीय प्रतीक हैं। सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और अनुशासन के साथ निभाई जा रही है। मंडी जनपद के बागीथाच क्षेत्र से संबंधित दोनों देवताओं का इतिहास रियासतकाल से जुड़ा है।
देव छांजणू शेषनाग के अवतार
लोकमान्यता के अनुसार देव छांजणू शेषनाग के अवतार माने जाते हैं और गुरु की भूमिका में प्रतिष्ठित हैं, जबकि देव छमांहू महाभारतकालीन हिडिंबा पुत्र घटोत्कच के रूप में पूजे जाते हैं। छमांहू को आधा देव और आधा राक्षस स्वरूप का प्रतीक माना जाता है, जो शक्ति और पराक्रम का द्योतक है।
शाही जलेब में सबसे आगे चलते हैं रथ
शाही जलेब की अगुआई का अधिकार इन दोनों देवताओं को प्राप्त है। जलेब के दौरान जब माधोराय की पालकी नगर भ्रमण पर निकलती है तो सबसे आगे छांजणू और छमांहू के रथ चलते हैं। ढोल-नगाड़ों और रणसिंघों की गूंज के बीच इनकी अगुवाई पूरे आयोजन को विशेष गरिमा प्रदान करती है।
देव छमाहूं के बिना देवी हिडिंबा का कोई भी धार्मिक कार्य नहीं होता पूरा
लोकविश्वास है कि देव छमांहू के बिना देवी हिडिंबा का कोई भी धार्मिक कार्य पूर्ण नहीं होता। मनाली में देवी हिडिंबा से मिलने के लिए भी दोनों देवता पैदल ही प्रस्थान करते हैं। मंडी शिवरात्रि की जलेब भी इनके बिना अधूरी मानी जाती है। सदियों से चली आ रही यह गुरु-शिष्य परंपरा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि मंडी की सांस्कृतिक विरासत की जीवंत पहचान भी है।
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